पूर्णिमा व्रत

कोलकाता · सोमवार, 22/03/2027

इस तारीख के समय अनुमानित हैं। नीचे गणना संबंधी जानकारी देखें।

सभी समय आपके चुने शहर के अनुसार हैं। तिथि समाप्ति का समय पारण समय नहीं है।

व्रत दिवस का सूर्योदय: 05:39. नीचे दिए समय या आचरण विधि के अनुसार पूजा करें।

परंपरानुसार पूजा, व्रत एवं पारण

सामान्य आचरण; कुल-परंपरा में भिन्नता संभव

पर्व की तिथि
21/03/2027, 18:22 – 16:13
विशेष निश्चित पूजा समय
इस परंपरा में सार्वभौम समय निर्धारित नहीं; कुलाचार और संकल्प के अनुसार करें
पारण
सार्वभौम निश्चित समय नहीं; संकल्प के अनुसार

महत्त्व

पूर्णिमा पूजा, दान और आत्मचिंतन का अवसर है।

व्रत / पूजा विधि

स्नान कर अपने इष्ट की पूजा करें, यथाशक्ति दान दें और लिए हुए पूजा या व्रत संकल्प का पालन करें।

महत्त्वपूर्ण नियम

सूर्योदय की पूर्णिमा और पूर्णिमा व्रत की तारीख अलग हो सकती है। व्रत प्रविष्टि में मध्याह्न नियम लागू है। सभी पूर्णिमा परंपराओं के लिए एक पारण समय नहीं है।

नियम संदर्भ: Drik Panchang

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गणना संबंधी जानकारी

समय चुने शहर के IANA ऐतिहासिक समय-क्षेत्र के अनुसार और तारीखें ग्रेगोरियन कैलेंडर में हैं। पंचांग दिवस सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक है। नीचे सूर्योदय की स्थिति और उसके बाद होने वाले प्रत्येक परिवर्तन का समाप्ति समय दिया गया है।

शहर के संदर्भ बिंदु: अव्यानि के मौजूदा स्थान और GeoNames डेटा (CC BY 4.0)। GPS का उपयोग नहीं होता। GeoNames

स्थापित एपिमेरिस के लिए समर्थित तारीखें: 01/04/1550 – 31/08/2649

अनुमानित/अनंतिम समय में पृथ्वी-घूर्णन का पूर्वानुमान या मापित डेटा के बाहर डेल्टा-टी मॉडल प्रयुक्त है। सुदूर शताब्दियों की अनिश्चितता व्रत-तारीखों को भी प्रभावित कर सकती है। ऐतिहासिक समय-क्षेत्र पुनर्निर्मित हैं; भविष्य के नियम बदल सकते हैं।

यमगंड और दिन का गुलिक काल सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच के आठ बराबर भागों पर आधारित हैं। वार के अनुसार इनके भाग सामान्य पंचांग परंपरा से लिए गए हैं। ये दैनिक समय हैं, व्यक्तिगत मुहूर्त का निर्णय नहीं।

दैनिक चंद्रोदय/चंद्रास्त और व्रत का चंद्रोदय मौजूदा अनुष्ठानिक चंद्रकेंद्र पद्धति से, बिना अपवर्तन के हैं। संदर्भ समय और क्षितिज की पद्धति चंद्र–सूर्य अनुभाग में देखें।

ब्रह्म मुहूर्त पिछली रात के सूर्यास्त से आज के सूर्योदय तक के पंद्रह बराबर भागों में चौदहवाँ है। प्रदोष में अव्यानि का रात्रि का पहला पाँचवाँ भाग और निशीथ में मध्य का पंद्रहवाँ भाग लिया गया है। ये चुनी हुई पद्धतियाँ हैं; सभी परंपराओं की परिभाषा समान होने का दावा नहीं है।

दुर्मुहूर्त में वार के अनुसार दिन के पंद्रहवें भाग लिए गए हैं; मंगलवार को रात का सातवाँ भाग भी है। भद्रा में विष्टि करण का पूरा समय है; वास, मुख और पुच्छ का विभाजन नहीं। चौघड़िया में दिन और रात के आठ-आठ, होरा में बारह-बारह भाग हैं। यह दैनिक होरा पद्धति कुंडली की मौजूदा होरा गणना नहीं बदलती। चौघड़िया का अमृत एक पारंपरिक नाम है, नक्षत्र-आधारित अमृत काल नहीं।

पारंपरिक स्रोत और तुलना के संदर्भ:ब्रह्म मुहूर्त: मनु ४.९२ और भाष्य · विवाह मुहूर्त में विष्टि: बृहत्संहिता १०० · चौघड़िया सारणी · होरा संदर्भ