इस तारीख के समय अनुमानित हैं। नीचे गणना संबंधी जानकारी देखें।
सभी समय आपके चुने शहर के अनुसार हैं। तिथि समाप्ति का समय पारण समय नहीं है।
व्रत दिवस का सूर्योदय: 05:39. नीचे दिए समय या आचरण विधि के अनुसार पूजा करें।
परंपरानुसार पूजा, व्रत एवं पारण
सामान्य आचरण; कुल-परंपरा में भिन्नता संभव
पर्व की तिथि
01:07 – 22:10
संध्या पूजा
सूर्यास्त के बाद 17:01 · निश्चित अंतिम समय की जानकारी उपलब्ध नहीं
व्रत · पारण आरंभ तक
05:39 – 19:47; पारण काल में पूजा के बाद समापन
चंद्रोदय / अर्घ्य
19:46 · चंद्र-दर्शन के बाद अर्घ्य
पारण
19:47 के बाद, पूजा पूर्ण होने पर
व्रत नियम
चंद्र-दर्शन, अर्घ्य और पूजा के बाद व्रत पूर्ण करें
महत्त्व
पूर्णिमान्त कार्तिक कृष्ण चतुर्थी; अमान्त में आश्विन।
व्रत / पूजा विधि
संकल्पानुसार व्रत करें। सूर्यास्त के बाद संध्या पूजा और चंद्र-दर्शन पर अर्घ्य देकर पूजा के बाद व्रत पूर्ण करें।
महत्त्वपूर्ण नियम
महेश शास्त्री के नियम में दोनों दिन चंद्रोदय पर चतुर्थी हो तो पहला दिन; दोनों में न हो तो दूसरा दिन चुना जाता है। संध्या की अंतिम सीमा का सूत्र सत्यापित नहीं, इसलिए अनुमानित समय नहीं दिया है।
समय चुने शहर के IANA ऐतिहासिक समय-क्षेत्र के अनुसार और तारीखें ग्रेगोरियन कैलेंडर में हैं। पंचांग दिवस सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक है। नीचे सूर्योदय की स्थिति और उसके बाद होने वाले प्रत्येक परिवर्तन का समाप्ति समय दिया गया है।
शहर के संदर्भ बिंदु: अव्यानि के मौजूदा स्थान और GeoNames डेटा (CC BY 4.0)। GPS का उपयोग नहीं होता। GeoNames
स्थापित एपिमेरिस के लिए समर्थित तारीखें: 01/04/1550 – 31/08/2649
अनुमानित/अनंतिम समय में पृथ्वी-घूर्णन का पूर्वानुमान या मापित डेटा के बाहर डेल्टा-टी मॉडल प्रयुक्त है। सुदूर शताब्दियों की अनिश्चितता व्रत-तारीखों को भी प्रभावित कर सकती है। ऐतिहासिक समय-क्षेत्र पुनर्निर्मित हैं; भविष्य के नियम बदल सकते हैं।
यमगंड और दिन का गुलिक काल सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच के आठ बराबर भागों पर आधारित हैं। वार के अनुसार इनके भाग सामान्य पंचांग परंपरा से लिए गए हैं। ये दैनिक समय हैं, व्यक्तिगत मुहूर्त का निर्णय नहीं।
दैनिक चंद्रोदय/चंद्रास्त और व्रत का चंद्रोदय मौजूदा अनुष्ठानिक चंद्रकेंद्र पद्धति से, बिना अपवर्तन के हैं। संदर्भ समय और क्षितिज की पद्धति चंद्र–सूर्य अनुभाग में देखें।
ब्रह्म मुहूर्त पिछली रात के सूर्यास्त से आज के सूर्योदय तक के पंद्रह बराबर भागों में चौदहवाँ है। प्रदोष में अव्यानि का रात्रि का पहला पाँचवाँ भाग और निशीथ में मध्य का पंद्रहवाँ भाग लिया गया है। ये चुनी हुई पद्धतियाँ हैं; सभी परंपराओं की परिभाषा समान होने का दावा नहीं है।
दुर्मुहूर्त में वार के अनुसार दिन के पंद्रहवें भाग लिए गए हैं; मंगलवार को रात का सातवाँ भाग भी है। भद्रा में विष्टि करण का पूरा समय है; वास, मुख और पुच्छ का विभाजन नहीं। चौघड़िया में दिन और रात के आठ-आठ, होरा में बारह-बारह भाग हैं। यह दैनिक होरा पद्धति कुंडली की मौजूदा होरा गणना नहीं बदलती। चौघड़िया का अमृत एक पारंपरिक नाम है, नक्षत्र-आधारित अमृत काल नहीं।