शिवपुराण सप्तमुखी रुद्राक्ष को “अनंग” कहता है; देखे गए इस अंश में उसे महालक्ष्मी का स्वरूप नहीं बताया गया।
स्रोत: The Siva Purana, Part I — Vidyesvara-samhita, Chapter 25 · Vidyesvara-samhita, Chapter 25 · Verse 72
सप्तमुखी रुद्राक्ष में सात प्राकृतिक मुख होते हैं। शिवपुराण में इसे “अनंग” कहा गया है और उपलब्ध एक उपनिषद्-अनुवाद में इसे सप्तमातृकाओं से जोड़ा गया है। परंपरागत मतभेदों को उनके मूल स्रोतों के अनुसार समझना आवश्यक है।

Rudraksha bead (Elaeocarpus angustifolius endocarp) · botanical fruit endocarp
रुद्राक्ष फल की सूखी और कठोर गुठली है। सात मुखी दाने की पहचान के लिए एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाने वाली सात प्राकृतिक और अखंड धारियाँ देखें। केवल बाहर से धारियाँ गिन लेना प्रामाणिकता का पूरा प्रमाण नहीं है। यह भी देखें कि दाना कहीं से कटा, चिपकाया, भरा या दोबारा तराशा तो नहीं गया। कीड़े से क्षतिग्रस्त, टूटा, फटा या विकृत दाना स्वीकार न करें। मूल्यवान दाने को आवर्धक लेंस से जाँचें। आवश्यकता होने पर किसी योग्य और स्वतंत्र परीक्षक से एक्स-रे तथा आंतरिक बनावट की जाँच कराएँ। इस परिचय में प्रयुक्त वनस्पति नाम Elaeocarpus angustifolius है। Elaeocarpus ganitrus उपलब्ध वर्गिकी स्रोतों में इसका प्रलेखित पर्याय है।
अपनी शैव परंपरा और व्यक्तिगत श्रद्धा के अनुसार सप्तमुखी रुद्राक्ष को मजबूत धागे में एक दाने के रूप में धारण किया जा सकता है। इसका उपयोग जपमाला में भी किया जाता है। शिवपुराण 1.25 में इसके लिए “ॐ हुं नमः” मंत्र दिया गया है। रुद्राक्ष-साधना में सामान्य पंचाक्षरी मंत्र “नमः शिवाय” का भी उल्लेख मिलता है।
उपलब्ध प्रामाणिक स्रोतों में शुद्धि की कोई एक ऐसी विधि नहीं मिलती, जिसे सभी परंपराओं के लिए अनिवार्य माना गया हो। सरल और सुरक्षित तैयारी के लिए दाने को स्वच्छ हाथों से ध्यानपूर्वक देखें। यदि उस पर ऐसी धातु-मढ़ाई या जड़ाई न हो जिसे जल से हानि पहुँच सकती हो, तो उसे थोड़े स्वच्छ पेयजल से पोंछें या शीघ्र धो लें। दाने को छाया में पूरी तरह सुखाएँ और फिर श्रद्धापूर्वक उपर्युक्त मंत्र का जप करें। दाना भिगोया हुआ जल न पिएँ। दूध, घी, तेल, रसायन या किसी कर्मकांड को दाने की प्रामाणिकता अथवा चिकित्सकीय शक्ति का प्रमाण न मानें।
रखरखाव: दाने को सूखा रखें, मुलायम कपड़े से पोंछें और देर तक भिगोने, रसायनों, अधिक गर्मी तथा चोट से बचाएँ। धागे और दरारों की समय-समय पर जाँच करें। परंपरागत मतभेदों को यथावत समझें: शिवपुराण 1.25.72 में “अनंग” और देखे गए उपनिषद्-अनुवाद में “सप्तमातृका” का संबंध मिलता है; उद्धृत अंश महालक्ष्मी या शनि-उपाय का उल्लेख नहीं करते। अस्थि-शक्ति, स्थिरता देने वाली ऊर्जा, धन, ग्रह, चक्र या सुनिश्चित फल के दावे अप्रमाणित हैं।
शिवपुराण सप्तमुखी रुद्राक्ष को “अनंग” कहता है; देखे गए इस अंश में उसे महालक्ष्मी का स्वरूप नहीं बताया गया।
स्रोत: The Siva Purana, Part I — Vidyesvara-samhita, Chapter 25 · Vidyesvara-samhita, Chapter 25 · Verse 72
इस परिचय में स्वीकृत वनस्पति नाम Elaeocarpus angustifolius Blume है; वर्तमान वर्गिकी स्रोतों में Elaeocarpus ganitrus इसका प्रलेखित पर्याय है।
स्रोत: Elaeocarpus angustifolius Blume — Plants of the World Online · Taxon record · Elaeocarpus angustifolius Blume
शिवपुराण 1.25.21–23 साबुत और स्वाभाविक दाने को वरीयता देता है; कीड़े से क्षतिग्रस्त, कटे, टूटे, फटे या विकृत दानों को अस्वीकार करता है और प्राकृतिक तथा मनुष्य द्वारा बनाए गए छिद्र में भेद बताता है। ये शास्त्रीय चयन-मापदंड हैं, पर आधुनिक प्रामाणिकता-जाँच का पूर्ण विकल्प नहीं।
स्रोत: The Siva Purana, Part I — Vidyesvara-samhita, Chapter 25 · Vidyesvara-samhita, Chapter 25 · Verses 21–23
शिवपुराण 1.25 में सप्तमुखी रुद्राक्ष के लिए “ॐ हुं नमः” मंत्र दिया गया है।
स्रोत: The Siva Purana, Part I — Vidyesvara-samhita, Chapter 25 · Vidyesvara-samhita, Chapter 25 · Mantra list after verse 81: Om Hum Namah