6 मुखी रुद्राक्ष

षण्मुखी रुद्राक्ष में छह प्राकृतिक मुख होते हैं। शिवपुराण में इसे भगवान कार्तिकेय का स्वरूप बताया गया है। शैव परंपरा में इसे श्रद्धापूर्वक धारण करने और जप में उपयोग करने की मान्यता है।

6 मुखी रुद्राक्ष का AI-निर्मित प्रतीकात्मक ज्ञानकोश चित्र
AI से निर्मित प्रतीकात्मक चित्र; प्राकृतिक दाने अलग हो सकते हैं और यह चित्र पहचान या प्रामाणिकता का प्रमाण नहीं है।

मानक पहचान

Rudraksha bead (Elaeocarpus angustifolius endocarp) · botanical fruit endocarp

पहचान और प्रामाणिकता

रुद्राक्ष फल की सूखी और कठोर गुठली है। छह मुखी दाने की पहचान के लिए एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाने वाली छह प्राकृतिक और अखंड धारियाँ देखें। केवल बाहर से धारियाँ गिन लेना प्रामाणिकता का पूरा प्रमाण नहीं है। यह भी देखें कि दाना कहीं से कटा, चिपकाया, भरा या दोबारा तराशा तो नहीं गया। कीड़े से क्षतिग्रस्त, टूटा, फटा या विकृत दाना स्वीकार न करें। मूल्यवान दाने को आवर्धक लेंस से जाँचें। आवश्यकता होने पर किसी योग्य और स्वतंत्र परीक्षक से एक्स-रे तथा आंतरिक बनावट की जाँच कराएँ। इस परिचय में प्रयुक्त वनस्पति नाम Elaeocarpus angustifolius है। Elaeocarpus ganitrus उपलब्ध वर्गिकी स्रोतों में इसका प्रलेखित पर्याय है।

धारण या उपयोग

अपनी शैव परंपरा और व्यक्तिगत श्रद्धा के अनुसार षण्मुखी रुद्राक्ष को मजबूत धागे में एक दाने के रूप में धारण किया जा सकता है। इसका उपयोग जपमाला में भी किया जाता है। शिवपुराण 1.25 में इसके लिए “ॐ ह्रीं हुं नमः” मंत्र दिया गया है। रुद्राक्ष-साधना में सामान्य पंचाक्षरी मंत्र “नमः शिवाय” का भी उल्लेख मिलता है।

तैयारी और शुद्धि

उपलब्ध प्रामाणिक स्रोतों में शुद्धि की कोई एक ऐसी विधि नहीं मिलती, जिसे सभी परंपराओं के लिए अनिवार्य माना गया हो। सरल और सुरक्षित तैयारी के लिए दाने को स्वच्छ हाथों से ध्यानपूर्वक देखें। यदि उस पर ऐसी धातु-मढ़ाई या जड़ाई न हो जिसे जल से हानि पहुँच सकती हो, तो उसे थोड़े स्वच्छ पेयजल से पोंछें या शीघ्र धो लें। दाने को छाया में पूरी तरह सुखाएँ और फिर श्रद्धापूर्वक उपर्युक्त मंत्र का जप करें। दाना भिगोया हुआ जल न पिएँ। दूध, घी, तेल, रसायन या किसी कर्मकांड को दाने की प्रामाणिकता अथवा चिकित्सकीय शक्ति का प्रमाण न मानें।

रखरखाव और आवश्यक सावधानी

रखरखाव: उपयोग के बाद दाने को सूखा रखें और मुलायम सूखे कपड़े से पोंछें। देर तक भिगोने, रसायनों, अधिक गर्मी, चोट और नम स्थान पर रखने से बचें। धागे और दरारों की समय-समय पर जाँच करें। कार्तिकेय से संबंध शास्त्रीय स्रोत में मिलता है; गणेश से अतिरिक्त संबंध वाले उपनिषद्-अनुवाद के संस्करण की पुष्टि अभी शेष है। हार्मोन, त्वचा-रोग, मधुमेह, कॉर्टिसोल, ग्रह, चक्र, आकर्षण या सुनिश्चित लाभ के दावे अप्रमाणित हैं।

प्रमाण और स्रोत

शास्त्रीय स्रोत

शिवपुराण षण्मुखी रुद्राक्ष को कार्तिकेय का स्वरूप बताता है।

स्रोत: The Siva Purana, Part I — Vidyesvara-samhita, Chapter 25 · Vidyesvara-samhita, Chapter 25 · Verse 71

वनस्पति-विज्ञान संदर्भ

इस परिचय में स्वीकृत वनस्पति नाम Elaeocarpus angustifolius Blume है; वर्तमान वर्गिकी स्रोतों में Elaeocarpus ganitrus इसका प्रलेखित पर्याय है।

स्रोत: Elaeocarpus angustifolius Blume — Plants of the World Online · Taxon record · Elaeocarpus angustifolius Blume

शास्त्रीय स्रोत

शिवपुराण 1.25.21–23 साबुत और स्वाभाविक दाने को वरीयता देता है; कीड़े से क्षतिग्रस्त, कटे, टूटे, फटे या विकृत दानों को अस्वीकार करता है और प्राकृतिक तथा मनुष्य द्वारा बनाए गए छिद्र में भेद बताता है। ये शास्त्रीय चयन-मापदंड हैं, पर आधुनिक प्रामाणिकता-जाँच का पूर्ण विकल्प नहीं।

स्रोत: The Siva Purana, Part I — Vidyesvara-samhita, Chapter 25 · Vidyesvara-samhita, Chapter 25 · Verses 21–23

शास्त्रीय स्रोत

शिवपुराण 1.25 में षण्मुखी रुद्राक्ष के लिए “ॐ ह्रीं हुं नमः” मंत्र दिया गया है।

स्रोत: The Siva Purana, Part I — Vidyesvara-samhita, Chapter 25 · Vidyesvara-samhita, Chapter 25 · Mantra list after verse 81: Om Hrim Hum Namah